सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र की परिभाषा और अर्थ समझने से पहले कुछ हलकी - फुलकी बात करते हैं। यह बात तीन चरणों में होगी।
१) मान ली जिए आप अपनी किसी आदत से परेशान हैं और छोड़ना चाहते हैं, जैसे की चाय पीने की आदत। पहले चरण में इस चाय पीने की आदत में सबसे पहले उन बातों को देखते हैं, जो है, जैसे कि, चाय, आप, आदत। इस चाय पीने की आदत में ये तीन चीज़े हैं। इसे हम देख सकते हैं और मान सकते हैं। अभी इसमें तर्क नहीं है। इसमें से किसी भी चीज़ को हम नहीं मानेंगे तो हम अगले चरण में नहीं जा पाएंगे। जैसे आपने खुद के होने के भाव को मान लिया, चाय के होने के भाव को मान लिया, लेकिन अगर आदत के होने के भाव को नहीं माना तो हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
२) अब हम उस चरण में आते हैं जहॉं हम चाय के बारे में, ख़ुद के बारे में और इस आदत के बारे में ज़्यादा गहराई से जानना शुरू करते हैं। जैसे कि, चाय की आदत बुरी है, मुझे चाय की आदत लग चुकी है, चाय मेरे शरीर के लिए ठीक नहीं है, चाय से क्या - क्या हानियाँ है शरीर को, चाय छोड़ने के उपाय ढूंढने होंगे, जिन लोगों ने चाय छोड़ी है उनसे बात करनी होगी, वगैरह - वगैरह। आप इन बातों का पूरा ज्ञान अलग-अलग माध्यम से लेते हैं, अपने आप से पूछ कर, दूसरों से पूछ कर, कहीं पढ़ कर, कुछ देख कर।
३) इतना बस मान लेने से और जाना लेने से चाय नहीं छूटेगी। तीसरे चरण में हम काम पर लगते हैं। चाय छोड़ने के सारे उपायों को अपने ऊपर लागु करना, चाय छोड़ने के संकल्प लेना, आदि। ऐसा करते - करते एक दिन आपकी चाय छूट जाती है। इसमें सफलता तब है जिस दिन आपकी चाय हमेशा के लिए छूट जाए। फिर आप और लोगों में भी अनुभव बांटते हैं और उनकी भी मदद करते हैं।
एक दूसरे उदहारण में घर बनाने की प्रक्रिया को समझते हैं,
१) पहले चरण में, फिर से, उन तथ्यों को सामने रखते हैं जो है। आप, आपकी घर बनाने की इच्छा, आपका बजट, ठेकेदार, ज़मीन, ईंट, पत्थर, सीमेंट, लोहा, लकड़ी, रेत, पानी, वगैरह। इन्हें हम मान सकते हैं, देख सकते हैं। यहां हमें समझने के लिए ये मानना है कि ये सब हमेशा से है, इसकी शुरुआत हमने नहीं की। अभी इसमें तर्क नहीं है।
२) दूसरे चरण में हम पहले चरण के सभी बातों का गहराई से जानकारी लेना शुरू करते हैं।। शुरुआत कहाँ से होती है घर बनाने की ? कैसा बनाना चाहिए ? कौनसा ठेकेदार अच्छा है ? कौनसी सीमेंट अच्छी है ? सीमेंट में कितना पानी मिलाना चाहिए ? दीवार कितनी चौड़ाई की रखनी चाहिए ? नींव कितनी रखनी चाहिए ? एक मंज़िला बनायें कि दो मंज़िला ? वगैरह - वगैरह।
३) तीसरे चरण में, हर चीज़ के ठीक तरीके से जानकारी लेने के बाद हम काम पर लगते हैं, क्योंकि बस जानकारी ले लेने से घर नहीं बनता। जब हम काम पर लग जाते हैं तो धीरे-धीरे घर भी तैयार हो जाता है। इस सफर में हम सफल तब कहलाते हैं जब हमारा बहुत ही सुन्दर और ज़रूरतों के अनुकूल घर तैयार हो जायेगा। फिर हम अपना अनुभव और लोगों में भी बाँटते हैं।
सक्षेप में हमने ये किया,
पहले हमने उसे माना जो है, फिर हमने उसका गहराई से ज्ञान लिया, फिर उस ज्ञान की मदद से काम पर लगे और सफल होने पर लोगों से अपना अनुभव बांटा। आप गौर कीजिये ये तीनों चरण एक दूसरे से किस तरह से जुड़े हुए हैं और एक क्रम में है।
आप सोच रहे होंगे मैं ये किस तरह के उदहरण दे रहा हूँ लेकिन लेकिन इन उदाहरणों का मतलब आप ख़ुद ब ख़ुद समझ जायेंगे जब आप तीनो रत्न - सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चरित्र के अर्थ को समझेंगे।
१) सम्यक् दर्शन :- पहले चरण में होता है दर्शन यानी देखना। इस ब्रह्माण्ड की उन सभी बातों को देखना और मानना जो मूल रूप से है, जैसे की ७ तत्त्व। तत्वों के सच की सही और अच्छे ढंग से जानकारी लेना सम्यक दर्शन है। आसान शब्दों में जीव, अजीव, कर्म, कर्मों का बंधन, कर्मों के परिणाम और मोक्ष के होने के भाव के समझना दर्शन है।
७ तत्वों के नाम - जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष
जब तक इन सात तत्त्वों के सच हम अच्छे से समझ नहीं लेते और मान नहीं लेते, तब तक हम दूसरे चरण में नहीं जाते।
२) सम्यक् ज्ञान :- तत्वों के सच को मानने के बाद, दूसरे चरण में आता है, उनका बौद्धिक और तार्किक द्रष्टी से ज्ञान लेने प्रक्रिया जिसे हम सम्यक् ज्ञान कहते हैं। ये ज्ञान हम आम तौर पर देख कर, महसूस कर, सूंघ कर, चख कर, सुन कर, और पढ़ कर लेते हैं।
ज्ञान लेने के पांच तरीके - मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्यय, केवलज्ञान
जब तक हम तत्त्वों का हर द्रष्टी से पूरा ज्ञान नहीं लेते, तब तक हम तीसरे चरण में नहीं जाते।
३) सम्यक् चरित्र :- इन सभी सच को जानने और समझने के बाद आता है काम पर लगने यानी चरित्र में लेन का समय। सारा ज्ञान लेकर रख लेने से कुछ नहीं होगा। मोक्ष की प्राप्ति के लिए हमें उस ज्ञान पर अमल करना होगा और उसे अपने चरित्र में लाना होगा। इसको चरित्र में लाने के लिए हमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का मार्ग अपनाना होता है।
इसके दो भेद - अणुव्रत (श्रावकों के लिए), महाव्रत (साधुओं के लिए)
इन व्रतों का पालन करके हम धीरे-धीरे मोक्ष के करीब पहुँचते हैं, बशर्ते हम इन सभी बातों का सम्यक् तरीके से बोध करने का लक्ष्य रखें।
अब आप समझ ही गए होंगे कि रत्नत्रय कैसे एक - दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनके इसी क्रम में होने का क्या महत्व है। ये भी समझ गए होंगे कि मैंने वो अजीब से उदहारण क्यों दिए। वैसे तो ये बहुत ही गहरे विषय हैं, मगर मैंने इनकी गहराई को संक्षिप्त में और आसान शब्दों में बताने की कोशिश की है।
सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र; ७ तत्त्व, ज्ञान के ५ भेद, व्रत के २ प्रकार, इन सभी की विस्तृत जानकारी देते हुए अलग से भी लिखूंगा।
अगर आपको यह तरीका अच्छा लगा हो तो टिपण्णी ज़रूर कीजिये और कोई त्रुटि हो तब भी बताइये।
ज्ञान देने के लिए धन्यवाद
जवाब देंहटाएंGreat. Very well said. Examples are so simple to understand the difficult concept
जवाब देंहटाएंVery nicely explained in very simple and easy understandable method. Thanks a lot.
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