ये ब्लॉग जैन धर्म के पंथों या इतिहास के बारे में नहीं है। कौन सा धर्म कब शुरू हुआ? कोई सा पंथ कब शुरू हुआ? कौन सा पंथ बेहतर है? इन बातों के अंत में केवल मतभेद ही रह जाते हैं और ज्ञान पीछे छूट जाता है, जो कि हो भी रहा है। आइये मान घटाएं और ज्ञान बढ़ाएं।
शुक्रवार, 18 सितंबर 2020
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गुरुवार, 17 सितंबर 2020
परस्परोपग्रहो जीवानाम् - Parasparopagraho Jivanam
परस्परोपग्रहो जीवानाम् - यह जैन दर्शन के आचार्य श्री उमास्वामी/उमास्वाति जी द्वारा संस्कृत में लिखे ग्रन्थ "तत्त्वार्थ सूत्र" के पांचवे अध्याय का इक्कीसवां श्लोक है। परस्परोपग्रहो जीवानाम् को जैन धर्म का आदर्श माना गया है।
इस शब्द का संधि विच्छेद करते हैं तो ये मिलता है,
परस्परोपग्रहो जीवानाम् = परस्पर + उप + गृह + जीवानाम्
परस्पर - एक दूसरे
उप - के प्रति
गृह - सहायक या सेवक
जीवानाम् - जीव
यानी सभी जीव एक दूसरे के प्रति सहायक या सेवक की भूमिका में हैं। सभी जीव से मतलब है, सूक्ष्म जीव से लेकर इंसान तक सभी जीव। इस दुनिया के सारे जीव एक दूसरे पर निर्भर हैं, एक दूसरे से बंधे हुए हैं, जुड़े हुए हैं। हमारे उपकार में किसी न किसी जीव का योगदान रहता है, और हम भी किसी न किसी जीव का उपकार करते हैं।
हम सब अलग-अलग हैं फ़िर भी बंधे हुए हैं और एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस बात को एक उदहारण से समझते हैं।
एक कमीज़ को देखिये। कहने को यह एक कमीज़ है लेकिन ये कई अलग - अलग टुकड़ों से बनी है। इस कमीज़ का हर एक टुकड़ा, चाहे कितना भी उच्च गुणवत्ता का और कितने भी सुन्दर रंगों का क्यों न हो, अलग-अलग रखें तो बेकार है, लेकिन जोड़ दें तो कमीज़ बनता है। पूरी कमीज़ को बने रहने में सारे टुकड़े एक दूसरे पर निर्भर है। किसी को बड़ा, छोटा, ज़्यादा या कम ज़रूरी नहीं कह सकते। इसी तरह अगर हम कमीज़ के एक टुकड़े को ध्यान से देखें तो वह कितने धागों के जुड़े रहने से बना है। बंधे रहने के लिए हर धागा दूसरे धागे पर निर्भर है।
आप अकेले ही बहुत कुछ कर रहे हो दुनिया के लिए ये सोचना भी गलत है और आप हमेशा किसी न किसी पर निर्भर ही रहोगे ये मानना भी गलत है। हम सभी को सभी की ज़रूरत है।
जब-जब इंसान मान और लोभ में आकर इस व्यवस्था से अपने आप को बाहर कर लेता है, तब-तब हमें अव्यवस्था, असंतुलन और अशांति देखने को मिलती है। आज के समय में अगर हम अपने चारों तरफ देखें तो ऐसा माहौल बढ़ता ही जा रहा है कई कारणों से।
जैसे हम जानवरों, पेड़-पौधों, हवा, पानी पर पूरी तरह से निर्भर हैं, लेकिन हमने इनका ख़्याल रखना, इनके बारें में सोचना बहुत कम कर दिया है, और इस वज़ह हम इन क्षेत्रों में लगातार तकलीफों की तरफ बढ़ रहे हैं।
हमारे नेता बन्दर बाँट का खेल खेल कर हमें बाँट देते हैं, और हम आसानी से उनकी बातों में आकर एक-दूसरे से झगड़ लेते हैं। नेताओं द्वारा खींची हुई लकीरों के कारण हम दंगो में अपनी जान गवां देते हैं। ये भी असंतुलन ही है जब हम भूल जाते हैं कि हमे एक-दूसरे का ख़्याल रखना है।
चूँकि मैं एक आदर्शवादी और आशावादी इंसान हूँ तो मुझे लगता है चाहे समय जैसा भी हो, चारों तरफ कुछ भी चल रहा हो, अगर हमें परस्परोपग्रहो जीवानाम् में विश्वास है तो इस पर अमल हर क्षण करना चाहिए। समय बदले न बदले आप तो बदल ही जायेंगे अच्छे के लिए। शुरुआत तो खुद से ही होती है।
अगर आपको यह तरीका अच्छा लगा हो तो टिपण्णी ज़रूर कीजिये और कोई त्रुटि हो तब भी बताइये।
अनेकांतवाद - Anekantavada
जैन दर्शन की बात की जाए तो कुछ शब्द अपने आप दिमाग में आते हैं, जैसे जय जिनेन्द्र, अहिंसा, महावीर, अपरिग्रह और अनेकांतवाद। अनेकांतवाद का सिद्धांत समझने में बड़ा ही रोचक और जीवन में काफी उपयोगी है। आइये समझे एक उदहारण से -
चिंटू के दो पडोसी हैं। एक को हम शर्मा जी मान लेते हैं और दूसरे को शुक्ला जी। चिंटू जब भी अपनी गली में घूम रहा होता है तो अक्सर शर्मा जी दिख जाते हैं, और वो कहते हैं, "क्यों रे चिंटू, दिन भर खेलता रहता है! पढ़ना नहीं होता?। जब शुक्ला जी चिंटू के घर आते हैं तो उन्हें चिंटू पढता हुआ नज़र आता है, तो शुक्ल जी कहते हैं चिंटू की मम्मी से, " आपका बेटा बड़ा होशियार है, कितना मन लगा कर पढता है।" चिंटू की मम्मी जवाब देती हैं, " नंबर तो आते नहीं लेकिन। अभी बैठा है डाँट खा कर। दिन भर खाता रहेगा और सोता रहेगा तो नंबर आएंगे भी कैसे।"
ये और बात है कि दुनिया में कोई ऐसा बच्चा है नहीं जो उतने नंबर ला पाए जितने उसके माता-पिता को खुश कर दे। खैर!
यहां पर सब चिंटू के बारे में अपना-अपना नज़रिया बता रहे हैं। अलग-अलग रखें तो सभी गलत हैं। चिंटू का असली सच तब मिलता है जब तीनों बातों को साथ में रखा जाए। लेकिन फ़िर भी पूरा सच नहीं मिलेगा। यही है अनेकांतवाद।
अनेकांतवाद को आसान शब्दों में ऐसे समझाया जाता है कि हर इंसान का अपना नज़रिया, अपना विचार होता है, और हमें हर नज़रिये, हर विचार का आदर करना चाहिए। किसी को गलत नहीं ठहराना चाहिए।
लेकिन हम अगर इस शब्द का संधि विच्छेद करें,
अनेकांतवाद = अनेक + अंत + वाद
अनेक - बहुत सारे
अंत - छोर
वाद - कथन
तो ये बनेगा कि किसी भी कथन के, यानी जो बात कही गयी है, उसके बहुत सारे छोर यानी पहलु होते है। कोई बात जो कई कही गयी है वो अपने में ही कभी भी पूरी नहीं होती।
अनेकांतवाद को अंग्रेजी में कहा जाता है many - sidedness या many - foldedness। अनेकांतवाद को समझने के लिए छः अंधों और एक हाथी की कहानी का वर्णन प्रायः मिलेगा।
अगर आप कोई वैज्ञानिक हैं या कोई शोधकर्ता हैं, तो आप अनेकांतवाद को ध्यान में रख कर अपने विषय के अधिक से अधिक पहलुओं को खोजेंगे। उससे आपकी शोध काफ़ी गहरी और सच के करीब होती चली जाएगी, मगर फ़िर भी पूरा सच नहीं।
क्योंकि अनेकांतवाद में ५, १० या १०० पहलुओं की बात नहीं कही गयी, अनेक पहलुओं की बात कही है, इसीलिए ये कहा जाता है कि आप किसी भी बात के सभी पहलुओं को कभी नहीं जान सकते। जो जान गए तो आप कहलायेंगे केवलज्ञानी, जिसे हम किसी और दिन समझेंगे।
यह सिद्धांत न सिर्फ बड़े निर्णय लेने में, बल्कि छोटी-छोटी बातों में भी बड़ा काम आता है। जैसे कि अगर आप इसको हमेशा ज़हन में रखेंगे तो किसी के बारे में भी आप पहली नज़र में राय बनाना छोड़ देंगे। आपको हमेशा लगेगा कि शायद जो मैंने देखा है सुना है वो गलत भी हो सकता है और सही भी है तो ये पूरा सच तो हो ही नहीं सकता। आप किसी व्यक्ति को बेहतर जान पाएंगे और उसके प्रति संवेदनशील हो पाएंगे।
ये सिद्धांत आपको हमेशा जिज्ञासु बनाये रखता है, और सबसे ख़ास बात ये आपको एक तरफ़ा या पक्षपाती होने से बचाता है, जिसकी आज के समय, जो की बड़ा polarized और extremist है, को बहुत ज़रूरत है।
अब अनेकांतवाद के नाम में अनेक अंत है तो अब आप ये भी समझ गए होंगे कि इसको समझाने का और इसको समझने का भी एक ही तरीका नहीं हो सकता। इसको जितना भी समझ पाया या कोई बढ़िया उदहारण बना पाया तो इसमें जोड़ता रहूंगा।
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अनेकांतवाद और आज की ताज़ा खबर - Anekantavada and the Headlines of the Day
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